एक सुबह एक छोटा बच्चा अपने पिता के साथ सड़क पार कर रहा था. चौराहे पर एक मज़दूर काम मिलने का इंतज़ार कर रहा था. उसके हाथ में खाने का छोटा-सा डिब्बा था. तभी लाल बत्ती पर एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी. उसमें बैठा एक अमीर आदमी फोन पर परेशान होकर बात कर रहा था. बच्चे ने दोनों को देखा और पिता से पूछा, पापा, गरीब आदमी परेशान क्यों है, उसके पास तो कुछ नहीं है. और अमीर आदमी परेशान क्यों है, उसके पास तो सब कुछ है? पिता तुरंत जवाब नहीं दे पाए. शायद बच्चे ने वह बात देख ली थी जिसे बड़े लोग अक्सर नहीं देख पाते. हमारे पास चीज़ें अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारे भीतर के डर कई बार एक जैसे होते हैं.

आज हर इंसान अपनी जिंदगी की कोई न कोई कीमत चुका रहा है. फुटपाथ पर सोने वाले को अगले भोजन की चिंता है. चौराहे पर खड़ा मज़दूर काम मिलने का इंतज़ार करता है, क्योंकि खाली हाथ लौटने का मतलब घर में चूल्हा न जलना हो सकता है. दफ़्तर का कर्मचारी नौकरी जाने से डरता है. बड़ा अधिकारी अपनी प्रतिष्ठा खोने से डरता है. यहां तक कि महल में रहने वाला राजा भी सोच सकता है कि किस पर भरोसा करे. सबकी परेशानियां बराबर नहीं हैं. भूख और सम्मान खोने का डर एक जैसे नहीं होते. फिर भी इनके पीछे एक सवाल छिपा है. जिस चीज़ के सहारे हम जी रहे हैं, अगर वह छिन गई तो हमारा क्या होगा?

सबसे बड़ी कीमत केवल जीने की नहीं

लेकिन शायद सबसे बड़ी कीमत केवल जीने की नहीं, दुनिया की नज़र में कुछ बनकर रहने की है. बच्चा जन्म लेते समय कोई पद या प्रतिष्ठा लेकर नहीं आता. धीरे-धीरे उससे उम्मीदें जुड़ने लगती हैं. अच्छा विद्यार्थी बनो. सफल बनो. परिवार का नाम ऊंचा करो. कमजोर मत दिखाई दो. बड़े होते-होते इंसान इतनी उम्मीदों का बोझ उठा लेता है कि खुद से पूछना भूल जाता है कि वह सचमुच क्या चाहता है. पहले दुनिया बताती है कि हमें कैसा बनना चाहिए. फिर एक दिन हम खुद को भी वही बातें समझाने लगते हैं.

30 साल की मेहनत

एक बड़े अधिकारी की कल्पना कीजिए. 30 साल की मेहनत से वह ऊंचे पद पर पहुंचा है. उसके कमरे में आते ही लोग खड़े हो जाते हैं. उसके फैसलों से सैकड़ों लोगों का काम जुड़ा है. एक शाम उसकी बेटी स्कूल के कार्यक्रम में आने को कहती है. वह वादा करता है, लेकिन ज़रूरी बैठक के कारण नहीं पहुंच पाता. घर लौटता है तो बेटी सो चुकी होती है. मेज पर उसकी बनाई तस्वीर रखी है. उसमें परिवार के सभी लोग साथ खड़े हैं, लेकिन पिता एक बड़ी इमारत के भीतर अकेले दिखाई देते हैं.

जिम्मेदारियों से मुक्त एक शाम

अधिकारी बहुत देर तक तस्वीर देखता रहता है. किसी ने उसे बुरा पिता नहीं कहा. फिर भी तस्वीर एक सवाल पूछ रही थी. क्या वह अपने पद के लिए इतना ज़रूरी बन गया कि अपने ही घर से दूर हो गया? अब उसी चौराहे के मज़दूर को देखिए. दिनभर ईंटें उठाने के बाद शाम को कुछ पैसे लेकर घर लौटता है. बेटा दौड़कर उससे लिपट जाता है. कुछ देर के लिए दिनभर की थकान हल्की हो जाती है. मज़दूर शायद अधिकारी जैसी आर्थिक सुरक्षा चाहता हो. अधिकारी शायद जिम्मेदारियों से मुक्त एक शाम चाहता हो. दोनों की जिंदगी में कमी है, लेकिन उनकी मुश्किलें बराबर नहीं हैं. एक रोज़ी-रोटी के लिए लड़ रहा है. दूसरे के पास ऐसे विकल्प हैं जो पैसा और पद देते हैं. दोनों का दर्द समझने का मतलब उनके बीच का यह अंतर भूल जाना नहीं है.

सफलता की उम्मीद

हम एक और कीमत चुपचाप चुकाते हैं. हम अपनी बनाई पहचान को बचाने लगते हैं, भले ही उसके भीतर खुद को खो रहे हों. बड़ा अधिकारी अपनी उलझन स्वीकार करने से डरता है. पिता आंसू छिपाता है क्योंकि उसे लगता है कि पिता को मजबूत रहना चाहिए. सफल व्यापारी थक जाने के बाद भी काम बढ़ाता रहता है क्योंकि लोग उससे और सफलता की उम्मीद करते हैं. धीरे-धीरे हम अपनी ही बनाई छवि में कैद हो जाते हैं. अजीब बात यह है कि उस कैद में हमें कोई दूसरा बंद नहीं करता. कई बार हम खुद ही उसके दरवाज़े की रखवाली करते हैं.

हमारी पहचान केवल हमारे काम या पद से बड़ी है?

लेकिन इसका मतलब जिम्मेदारियों से भागना नहीं है. कोई माता-पिता अपनी आजादी के नाम पर भूखे बच्चे को छोड़ नहीं सकते. कोई नेता अपने फैसलों पर निर्भर लोगों को भूल नहीं सकता. सवाल जिम्मेदारियां छोड़ने का नहीं, उन्हें निभाते हुए इंसान बने रहने का है. क्या कोई बड़ा पद संभालकर भी उसका गुलाम बने बिना रह सकता है? क्या परिवार के लिए कमाते हुए परिवार का हिस्सा बना रह सकता है? क्या हम यह याद रख सकते हैं कि हमारी पहचान केवल हमारे काम या पद से बड़ी है?

शायद शुरुआत खुद से एक सवाल पूछने से हो सकती है. हमें सबसे ज्यादा किस चीज़ के खोने का डर है? पैसा, सम्मान, लोगों की तारीफ या अपना अधिकार? फिर देखिए कि यह डर हमसे क्या करवाता है। क्या हम ज्यादा दयालु बनते हैं या कठोर? सच बोलते हैं या अपनी छवि बचाते हैं? क्या यह डर ज़रूरी चीज़ों की रक्षा करता है, या हमें उन्हीं से दूर ले जाता है?

किसी की परेशानी खत्म नहीं हुई

बच्चा अपने पिता के साथ आगे बढ़ गया. मज़दूर अब भी काम का इंतज़ार कर रहा था. गाड़ी में बैठा आदमी अब भी फोन पर बात कर रहा था. किसी की परेशानी खत्म नहीं हुई थी. लेकिन अगर हम सब दुनिया की उम्मीदों के मुताबिक बने रहने की कोई न कोई कीमत चुका रहे हैं, तो क्या हमने कभी खुद से पूछा है कि जिस इंसान को बचाने के लिए हम इतनी मेहनत कर रहे हैं, क्या हम सचमुच वही इंसान बनना चाहते थे?