एक नौजवान सुबह काम पर निकल रहा था. रसोई से मां ने पूछा, ‘बेटा, कुछ खाया?’. उसे पहले ही देर हो रही थी. झुंझलाकर बोला, ‘मां, कितनी बार एक ही बात पूछोगी? मैं अपना खयाल रख सकता हूं’. मां चुप हो गई. वह बैग उठाकर निकल गया. शाम को लौटा तो खाने की मेज पर ढकी हुई थाली रखी थी. पास में एक पर्ची थी, ‘ठंडा होने से पहले खा लेना’. वह मुस्कुराया, लेकिन मन में कुछ चुभ गया. सुबह मां ने उसकी नाराजगी सुनी थी, फिर भी उसका खयाल रखा. वह सोचने लगा, क्या मां अपने बच्चों की कड़वी बातें सुनने की आदी हो जाती है, सिर्फ इसलिए कि वह उनसे प्यार करती है?
हम मां से कभी-कभी तीन ऐसी बातें कह देते हैं, जिनकी चोट समझ नहीं पाते. पहली है, ‘मां, तुम्हें कुछ नहीं पता’. जब मां नई तकनीक नहीं समझती, हमारे फैसले पर सवाल करती है या पुरानी सलाह देती है, तो हम ऐसा कह देते हैं. कभी सचमुच उसे किसी बात की जानकारी नहीं होती. दुनिया बदलती है और बच्चे कई नई बातें सीखते हैं, लेकिन ‘मां, मैं समझाता हूं’ और ‘तुम्हें कुछ नहीं आता’ में बहुत फर्क है. जब हमें बोलना भी नहीं आता था, तब किसी ने हमारे अधूरे शब्द धैर्य से सुने थे. आज मां हमारी दुनिया समझने में कठिनाई महसूस करती है, तो क्या हम उसे वही धैर्य दे पाते हैं?
‘बड़े होने का मतलब एक-दूसरे की समझ का सम्मान करना’
कुछ बातें किताबों या मोबाइल से नहीं सीखी जातीं. मां हंसती आवाज के पीछे छिपी चिंता पहचान सकती है. किसी का कम खाना या अचानक चुप हो जाना उसे परेशान कर सकता है. यह समझ हमेशा सही नहीं होती. मां से भी गलतियां होती हैं, लेकिन अक्सर यह वर्षों तक किसी का ध्यान रखने से आती है. हम बदलती दुनिया को ज्यादा जानते होंगे, पर मां उस बच्चे को जानती है जो कभी अपनी भावनाएं छिपाना नहीं जानता था. शायद बड़े होने का मतलब यह तय करना नहीं कि कौन ज्यादा जानता है, बल्कि एक-दूसरे की समझ का सम्मान करना है.
दूसरी बात है, ‘तुमने मेरे लिए किया ही क्या है?’. पैसे, आजादी या किसी अधूरी इच्छा पर बहस करते समय यह बात निकल जाती है. उस पल हमें वह याद रहता है जो नहीं मिला. जो रोज मिलता रहा, वह भूल जाते हैं. बीमार बच्चे के पास रातभर जागती मां को याद कीजिए. थकान में भी खाना बनाना, कपड़े धोना और अपनी कोई जरूरत टाल देना याद कीजिए. हर मां का जीवन एक जैसा नहीं होता और हर बचपन प्यार से भरा भी नहीं होता, लेकिन जहां देखभाल मिली है, वहां उसकी सबसे बड़ी बात यही है कि उसका कोई हिसाब नहीं रखा जाता. जन्मदिन का उपहार याद रहता है, बचपन संभालने वाले सैकड़ों साधारण दिन अक्सर भूल जाते हैं, लेकिन मां का प्यार ऐसा कर्ज भी नहीं होना चाहिए जिसे बच्चा कभी चुका न सके.
‘तुमने मेरे लिए कुछ नहीं किया’
मां बहुत प्यार करके भी गलत हो सकती है. बड़े हुए बच्चे को अपनी आजादी, अकेले रहने का समय और अलग रास्ता चुनने का अधिकार है. आभार मानने का मतलब हर बात मान लेना नहीं है. सवाल इतना है कि क्या हम असहमत होते हुए भी मिले हुए प्यार का सम्मान कर सकते हैं? जब कहते हैं, ‘तुमने मेरे लिए कुछ नहीं किया’, तो क्या सच बोल रहे होते हैं, या बहस जीतने के लिए सबसे चुभने वाले शब्द चुन रहे होते हैं?
तीसरी बात है, ‘मां, मुझे अकेला छोड़ दो’. कभी सचमुच अकेले रहने की जरूरत होती है. हम थके होते हैं, परेशान होते हैं या बात नहीं करना चाहते. इसमें कुछ गलत नहीं है, लेकिन ‘मुझे थोड़ा समय दो, बाद में बात करेंगे’ और ‘यहाँ से चली जाओ’ में बड़ा फर्क है. पहली बात अपनी जरूरत बताती है. दूसरी किसी को यह सोचने पर मजबूर कर सकती है कि क्या अब हमारी जिंदगी में उसके लिए जगह बची है. गुस्सा उतरने पर हम अपनी कही बात भूल जाते हैं, लेकिन सुनने वाले को वह याद रह सकती है.
‘मां की मौजूदगी की याद आती है’
कल्पना कीजिए, मां को खो चुकी एक महिला पुरानी रसोई की अलमारी खोलती है. भीतर एक स्टील का डिब्बा मिलता है, जिस पर मां की लिखावट वाला पुराना कागज चिपका है. उसे याद आता है कि वह मां से अक्सर कहती थी, ‘इतनी चीजें संभालकर क्यों रखती हो?’. अब वह देर तक डिब्बा पकड़े रहती है. उसे डिब्बे की नहीं, उसके पीछे छिपी मां की मौजूदगी की याद आती है. दूसरे कमरे से आती आवाज, बार-बार दी जाने वाली सलाह और वो सवाल, जिनसे कभी चिढ़ होती थी. आज वह सब दोबारा सुनना चाहती है, लेकिन रसोई खामोश है.
हर रिश्ते में कभी न कभी मन दुखता है. कोई परिवार हमेशा बिना झगड़े के नहीं रह सकता, लेकिन हम उस पल को पहचानना सीख सकते हैं, जब गुस्सा हमारे शब्द चुनने लगता है. बोलने से पहले पूछ सकते हैं कि हम अपना दुख समझाना चाहते हैं या किसी दूसरे को दुख देना चाहते हैं. मां से उसके अपने जीवन, इच्छाओं और उन बातों के बारे में भी पूछ सकते हैं जो वह कभी कह नहीं पाई. मां केवल हमें पालने वाली नहीं, अपनी भावनाओं और अधूरी कहानियों वाली एक इंसान भी है.
माफी मांगने में कोई दिक्कत नहीं
जिस नौजवान को शाम को खाने की थाली मिली थी, वह रसोई में गया. मां बर्तन धो रही थी. वह पास खड़ा होकर बोला, ‘मां, सुबह मैंने गलत बात कह दी. माफ कर दो’. मां ने उसकी ओर देखा, मुस्कुराई और पूछा, ‘खाना खाया?’. अगर एक दिन वह आवाज हमेशा के लिए खामोश हो जाए, जो बार-बार पूछती है कि हम ठीक हैं या नहीं, तो अपनी कही हुई कौन-सी बात होगी जिसे वापस लेने के लिए हम कुछ भी देने को तैयार होंगे?

