एक छोटे बच्चे को उसके दादाजी ने वायलिन दिया. बच्चा बहुत खुश हुआ. वह तुरंत कोई सुंदर धुन बजाना चाहता था. लेकिन जैसे ही उसने वायलिन बजाया, अजीब आवाज़ निकली. उसने दोबारा कोशिश की, इस बार और ज़ोर लगाया, लेकिन धुन नहीं निकली. नाराज़ होकर उसने वायलिन रख दिया. दादाजी ने पूछा, क्या हुआ? बच्चा बोला, शायद मैं इसे कभी नहीं बजा पाऊंगा. दादाजी मुस्कुराए, तुमने केवल 10 मिनट कोशिश की और तय कर लिया कि तुम क्या बन सकते हो. क्या पता, यह संगीत उस बच्चे का इंतज़ार कर रहा हो जो तुम अभी बने ही नहीं हो?

बच्चा उनकी बात समझ नहीं पाया. उसे लगता था कि किसी चीज़ को दिल से चाहना ही उसे पाने के लिए काफी है. वह नहीं जानता था कि कई बार सपने तक पहुंचने के लिए केवल समय नहीं, खुद को भी बदलना पड़ता है.

‘विश्वास से हमें सहारा मिलता है’

हम अक्सर समय को ऐसी चाबी समझते हैं जो हर बंद दरवाज़ा खोल सकती है. कुछ नहीं होता तो कहते हैं, अभी सही समय नहीं आया. इस विश्वास से हमें सहारा मिलता है. घाव भरने में समय लगता है. कड़वी बातों से टूटी दोस्ती को फिर जुड़ने में समय लग सकता है. कोई कठिन काम एक दिन में नहीं सीखा जा सकता. लेकिन समय की एक अजीब बात है. वह दर्द कम कर सकता है, पर माफ करना नहीं सिखा सकता. उम्र बढ़ा सकता है, पर समझदारी नहीं दे सकता. वर्षों बीत सकते हैं, फिर भी हम खुद को नहीं समझ पाते. समय बदलने का अवसर देता है, लेकिन उस अवसर का क्या करना है, यह कुछ हद तक हमारे हाथ में होता है.

प्रवेश परीक्षा में असफल

एक लड़की डॉक्टर बनना चाहती थी. प्रवेश परीक्षा में असफल हो गई. उसके दोस्त मेडिकल कॉलेज पहुंच गए. उसे लगा कि वह पीछे रह गई है. पिता ने कहा, फिर कोशिश करो. मां ने पूछा, क्या कोई दूसरा काम तुम्हें ज्यादा अच्छा लगेगा? दोनों उससे प्यार करते थे, लेकिन उनकी सोच अलग थी. पिता मानते थे कि कोशिश करते रहना साहस है. मां समझती थीं कि रास्ता बदलना भी साहस हो सकता है. फैसला लड़की को करना था. उसे खुद से पूछना था कि क्या वह आज भी बीमार लोगों की सेवा करना चाहती है, या केवल असफल कहलाने से डर रही है. एक और साल उसे परीक्षा के लिए तैयार कर सकता था, लेकिन वह किसलिए तैयारी कर रही है, इसका जवाब उसे अपने भीतर खोजना था.

हम इंसान जल्दी परिणाम चाहते हैं

हम इंसान जल्दी परिणाम चाहते हैं. हम मंज़िल पाना चाहते हैं, लेकिन उस यात्रा से गुजरना नहीं चाहते जो हमें वहां पहुंचने लायक बनाती है. बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है. नया कर्मचारी बड़ी जिम्मेदारी चाहता है, बिना उसका बोझ समझे. किसी से चोट खाया व्यक्ति फिर भरोसा करना चाहता है, लेकिन भीतर का डर नहीं देखना चाहता. कुछ बातें जल्दी नहीं सीखी जा सकतीं. गलतियां, दुख, अभ्यास और अपने बारे में सोचना हमें तैयार करते हैं. जो जिम्मेदारी समय से पहले बोझ लगती है, वही अनुभव आने पर खुशी दे सकती है.

अपने डर को तैयारी न समझें

लेकिन धैर्य में भी एक खतरा है. कभी-कभी हम इंतज़ार करने के इतने आदी हो जाते हैं कि देखना ही छोड़ देते हैं कि हम आगे बढ़ भी रहे हैं या नहीं. अपने डर को तैयारी और अपनी हिचकिचाहट को समझदारी कहने लगते हैं. इसलिए इंतज़ार के साथ सीखना भी जरूरी है. आज हमने ऐसा क्या समझा जो कल नहीं जानते थे? कौन-सी आदत बदली? कौन-सा सच स्वीकार किया? अगर साल बीत रहे हैं, लेकिन हमारे भीतर कुछ नहीं बदल रहा, तो शायद हम भविष्य की तैयारी नहीं कर रहे. केवल आज को बीतने दे रहे हैं.

हाथ से निकलने वाला अवसर

एक और बात है. देर से मिलने वाला हर अवसर इनाम नहीं होता और हाथ से निकलने वाला हर अवसर नुकसान नहीं होता. कभी समझ आता है कि जिसे हम बहुत चाहते थे, उसके लिए ऐसी जिंदगी जीनी पड़ती जो हमें पसंद नहीं थी. बड़ा पद पहचान दे सकता है, लेकिन पसंद का काम छीन सकता है. कोई रिश्ता साथ दे सकता है, लेकिन उसमें खुद को छिपाना पड़ सकता है. उम्र के साथ हम इन बातों को बेहतर समझ सकते हैं. संभव है कि दुनिया नहीं बदली हो, केवल उसे समझने की हमारी क्षमता बदल गई हो.

हमारा समय कब आएगा?

शायद हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि हमारा समय कब आएगा. यह भी पूछना चाहिए कि जब वह समय आएगा, तब हम कैसे इंसान होंगे. क्या हमने धैर्य रखना, मेहनत करना, गलतियां स्वीकार करना और दूसरों की बात सुनना सीखा होगा? क्या हम समझ पाए होंगे कि हमारे लिए सचमुच क्या जरूरी है? या हम उसी डर के साथ खड़े होंगे, यह उम्मीद करते हुए कि समय हमारे बदले सब कुछ बदल देगा?

वायलिन वाला बच्चा फिर सीखने लगा. कभी अच्छी धुन निकलती, कभी गलत सुर. लेकिन धीरे-धीरे उसने यह पूछना छोड़ दिया कि वह संगीतकार कब बनेगा. अब वह हर गलती से कुछ सीखने लगा था. अगर जिस अवसर का हम सारी जिंदगी इंतज़ार करते रहे, वह कल हमारे सामने आ जाए, तो क्या हम उसे अपनाने के लिए तैयार होंगे, या हमने इतने साल दुनिया के बदलने का इंतज़ार किया और खुद वहीं खड़े रह गए जहां पहले थे?