एक विद्यार्थी ने अपने गुरु से पूछा, किसी से सबसे अच्छा प्यार कैसे किया जा सकता है? गुरु ने तुरंत जवाब नहीं दिया. उन्होंने एक गरीब आदमी की कहानी सुनाई. एक दिन भगवान ने उस आदमी को अनोखा वरदान दिया. सुबह आंख खुली तो वह एक शानदार महल में था. सुंदर कमरे, अच्छे कपड़े, स्वादिष्ट भोजन, घोड़े, नौकर और बेहिसाब धन. लेकिन एक शर्त थी. भगवान ने कहा, यह सब सात दिनों तक तुम्हारा रहेगा. 8वें दिन सब गायब हो जाएगा.

आदमी ने वरदान स्वीकार कर लिया. उसने बगीचों में घूमकर, अच्छा भोजन खाकर और हर सुविधा का आनंद लेकर सात दिन बिताए. 8वें दिन महल गायब हो गया. वह फिर गरीब हो गया. भगवान ने पूछा, क्या तुम्हें दुख नहीं हुआ? आदमी मुस्कुराया, दुख क्यों होगा? मुझे पहले से पता था कि यह सब हमेशा नहीं रहेगा. जब तक मिला, खुशी से जिया. अब चला गया, तो इसे भी स्वीकार करता हूं.

शाम को लौटाना पड़ेगा खिलौना?

गुरु ने विद्यार्थी से पूछा, मान लो, कोई तुम्हें दोपहर भर खेलने के लिए सुंदर खिलौना दे. क्या तुम इसलिए नहीं खेलोगे कि शाम को लौटाना पड़ेगा? विद्यार्थी ने सिर हिलाया. गुरु ने फिर पूछा, क्या तुम खिलौना इसलिए तोड़ दोगे कि वह हमेशा तुम्हारा नहीं रहेगा? विद्यार्थी बोला, नहीं. गुरु ने पूछा, तो फिर जिन लोगों से हम प्यार करते हैं, उनसे यह उम्मीद क्यों रखते हैं कि वे हमेशा हमारे मन के मुताबिक रहें और कभी हमसे दूर न जाएं?

यह सवाल हमारे भीतर की ऐसी बात को छूता है, जिसे हम अक्सर देखना नहीं चाहते. हम कहते हैं कि किसी से प्यार करते हैं, लेकिन उस प्यार के भीतर कई उम्मीदें छिपी होती हैं. मेरे पास रहो. मेरी तरह सोचो. कभी मत बदलो. मुझे छोड़कर मत जाओ. मुझे हमेशा महत्व दो. हम ये बातें कहते नहीं, लेकिन जब दूसरा व्यक्ति हमारी उम्मीदों के अनुसार नहीं चलता, तो दुखी हो जाते हैं.

अपनी आजादी चाहता है बच्चा

बच्चा बड़ा होकर अपनी आजादी चाहता है. दोस्त की पसंद बदल जाती है. जीवनसाथी कुछ समय अकेला रहना चाहता है. हमें लगता है कि प्यार कम हो गया. लेकिन क्या सचमुच प्यार कम हुआ है, या हमने प्यार पाने को अपनी हर जरूरत पूरी होने से जोड़ लिया है?

एक मां अपनी बेटी को साइकिल चलाना सिखा रही है. शुरू में वह पीछे से साइकिल पकड़कर चलती है. बच्ची डरते-डरते पैडल मारती है. फिर मां धीरे से हाथ छोड़ देती है. बच्ची आगे निकल जाती है और खुशी से हंसने लगती है. मां को गर्व होता है, लेकिन मन में हल्की उदासी भी आती है. जो बच्ची कभी उसका हाथ पकड़े बिना नहीं चल पाती थी, वह अब अपने आप आगे बढ़ रही है. अगर मां हमेशा साइकिल पकड़े रहती, तो बेटी शायद कभी चलाना नहीं सीखती. कभी प्यार का मतलब किसी को संभालना होता है, तो कभी उस पर भरोसा करके अपना हाथ हटा लेना.

क्या कोई कीमती चीज खोकर इंसान मुस्कुरा सकता है?

लेकिन सात दिनों के महल की कहानी एक कठिन सवाल भी उठाती है. क्या कोई कीमती चीज खोकर इंसान सचमुच मुस्कुरा सकता है? धन खोना और किसी अपने को खोना एक जैसी बात नहीं है. बच्चे को खोने वाले माता-पिता केवल यह समझकर शांत नहीं हो सकते कि दुनिया में कुछ स्थायी नहीं है. किसी अपने से धोखा खाने वाले को सँभलने में वर्षों लग सकते हैं. जिंदगी बदलती रहती है, यह जान लेने से दुख खत्म नहीं होता. शायद उस गरीब आदमी की समझदारी यह नहीं थी कि उसे कुछ महसूस नहीं हुआ, बल्कि यह थी कि उसने 8वें दिन की चिंता में अपने सात दिन खराब नहीं किए.

माता-पिता के साथ हमारा समय सीमित

किसी चीज के हमेशा न रहने को स्वीकार करना और उसकी परवाह न करना भी अलग बातें हैं. दोस्ती हमेशा नहीं रहेगी, यह सोचकर उससे दूर भागना जरूरी नहीं. बल्कि जब तक दोस्ती है, ईमानदार रहना जरूरी है. माता-पिता के साथ हमारा समय सीमित है, तो उनसे प्यार करने से डरने के बजाय उनकी बातें ध्यान से सुननी चाहिए. यह समझना कि कोई इंसान हमारी संपत्ति नहीं है, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी कम नहीं करता. शायद हमारा प्यार और सच्चा हो जाता है.

शायद हमारा सबसे गहरा डर किसी अपने को खोने से भी आगे का है. हम डरते हैं कि उसके बिना हम कौन होंगे. हमारी बातें कौन सुनेगा? हमारी छोटी-छोटी पसंद कौन याद रखेगा? हमारे साथ कौन रहेगा? इसी डर से कभी प्यार किसी को अपने अनुसार चलाने की कोशिश बन जाता है. हम दूसरे को हमेशा अपने पास रखना चाहते हैं, क्योंकि उसके बिना खुद का सामना करने से डरते हैं. लेकिन कोई इंसान हमें हर बदलाव से बचाने का वादा नहीं कर सकता. सबसे करीबी रिश्ते में भी दोनों को अपनी जिंदगी जीने की जगह चाहिए.

उसके जाने पर कम दुख हो?

विद्यार्थी कुछ देर चुप रहा. फिर पूछा, गुरुजी, तो क्या किसी से कम प्यार करना चाहिए, ताकि उसके जाने पर कम दुख हो? गुरु ने कहा, नहीं. इसका मतलब है कि उसे खोने का डर तुम्हें उससे अच्छी तरह प्यार करने से न रोके. शायद हम एक छोटे सवाल से शुरुआत कर सकते हैं. आज जब किसी अपने से मिलें, तो सोचें कि क्या हम उसे वैसे देख रहे हैं जैसा वह सचमुच है, या जैसा हमने अपने मन में उसे बना रखा है? शायद प्यार तब ज्यादा कोमल हो जाता है, जब हम हर आज से कल की गारंटी मांगना छोड़ देते हैं.

किसी अपने के साथ हमारे पास कितने दिन

उस गरीब आदमी के पास महल में रहने के लिए सात दिन थे. हमें नहीं पता कि किसी अपने के साथ हमारे पास कितने दिन हैं. यह अनजान बात हमें डराने के बजाय आज को पूरी तरह जीना सिखा सकती है. अगर हमें पता हो कि जिससे हम प्यार करते हैं, वह हमेशा हमारे साथ नहीं रह सकता, तो क्या हम अपना समय उसे रोककर रखने में बिताएंगे, या जब तक वह हमारे साथ है, तब तक उसे सचमुच प्यार करना सीखेंगे?