राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत का कहना है कि दुनिया की सभी समस्याएं अहंकार और स्वार्थ से पैदा होती हैं. उन्होंने कहा कि ये समस्याएं आपसी जुड़ाव और एक-दूसरे के प्रति परवाह की कमी के कारण उत्पन्न हुई हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि सेवा निस्वार्थ भाव से की जानी चाहिए, जिसमें किसी तरह की पहचान या प्रशंसा पाने की इच्छा न हो.

मोहन भागवत ने शनिवार (7 नवंबर) को राजबक्शा हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित ‘समर्पण फाउंडेशन’ के रजत जयंती समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की. इस दौरान उन्होंने कहा कि सेवा का कभी प्रदर्शन नहीं होना चाहिए. सेवा चुपचाप और बिना किसी अपेक्षा के होती रहनी चाहिए.

‘सेवा दिखावे के लिए नहीं होती…’

अपने संबोधन में मानवीय संवेदनशीलता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए, भागवत ने कहा ‘सेवा मानवता की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है. सेवा दिखावे के लिए नहीं होती. यह चुपचाप और बिना थके चलती रहती है. कोविड-19 महामारी के दौरान, जब मैंने नागपुर के स्वयंसेवकों से सेवा भाव से किए जा रहे कार्यों के बारे में पूछा, तो पता चला कि दो महीनों के भीतर ही ऐसे लगभग 40 कार्य चल रहे थे. ‘समर्पण फाउंडेशन’ भी उनमें से एक था’.

उन्होंने आगे कहा कि 25 साल बाद फाउंडेशन के कार्यों को उजागर करने का उद्देश्य प्रचार करना नहीं, बल्कि दूसरों को भी ऐसे ही सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित करना है.

‘संवेदनशीलता इंसान को जानवरों से अलग करती है’

भागवत ने कहा ‘संवेदनशीलता ही इंसान को जानवरों से अलग करती है. इंसान संवेदनशील होते हैं, इसलिए वे सेवा का मार्ग अपनाते हैं. सेवा मनुष्य का एक स्वाभाविक गुण है. भले ही दुनिया में एक भी दुखी व्यक्ति न बचे, फिर भी इंसान समाज की सेवा करने के तरीके खोजते रहेंगे’.

भागवत ने कोविड-19 संकट को किया याद

कोविड-19 संकट को याद करते हुए भागवत ने कहा कि वह बहुत कठिन दौर था. उन्होंने कहा, ‘उस समय हमने कई लोगों से बात की और उन्हें उम्मीद बनाए रखने में मदद की. इससे यह स्पष्ट हुआ कि पूरे देश में जितना अच्छा काम हो रहा था, वह लोगों की कल्पना से कहीं अधिक था’.

RSS प्रमुख ने कहा ‘कुछ साल पहले, मेरे मन में यह विचार आया कि समाज में ऐसे कई लोग हैं जो अच्छे काम कर रहे हैं, लेकिन वे दिखाई नहीं देते, सामने नहीं आते और चुपचाप अपना काम करते रहते हैं. इसलिए, मैंने नागपुर के कार्यकर्ताओं से कहा कि वे ऐसे लोगों को खोजें. और जब उन्होंने नागपुर में खोजना शुरू किया, तो दो महीने के भीतर ही ऐसे 40 लोग मिल गए’.

मोहन भागवत ने कहा ‘जब बाघ लोगों पर हमला करते हैं और उन्हें मार डालते हैं, तब भी कुछ इंसान ऐसे होते हैं जो उन बाघों को बचाने की कोशिश करते हैं. यह संवेदना (empathy) की बात है. जैसे खाना-पीना, अपनी प्रजाति को आगे बढ़ाना और खुद को सुरक्षित रखना जिसे अंग्रेजी में ‘इंस्टिंक्ट’ (instinct) या स्वाभाविक प्रवृत्ति कहा जाता है ये सब चीजें मौजूद होती हैं’.

‘जानवर केवल अपनी चिंता करता है…’

RSS प्रमुख ने कहा ‘अगर दुनिया में सेवा की जरूरत खत्म भी हो जाए और कोई भी इंसान दुखी न बचे, तब भी इंसान सेवा करना बंद नहीं करेगा. क्योंकि जानवरों और इंसानों में यही फर्क है. जानवर केवल अपनी चिंता करता है, और जब तक वह अपने परिवार को ‘अपना’ मानता है, तब तक वह उस परिवार की सेवा करता है. वह इसके अलावा कोई और सेवा नहीं करता. वह अपने परिवार की सेवा इसलिए करता है क्योंकि यह जरूरी है, और सेवा करने से वह खुद भी सुरक्षित रहता है’.

‘जिनके पास पैसा नहीं है, वे भी सेवा कर सकते हैं’

उन्होंने कहा ‘इसके लिए किसी खास क्षमता की जरूरत नहीं होती. जिनके पास पैसा है, वे भी सेवा कर सकते हैं. जिनके पास पैसा नहीं है, वे भी सेवा कर सकते हैं और करते भी हैं. जिनके पास समय नहीं है, वे भी समय निकालकर सेवा करते हैं’

इससे पहले, फाउंडेशन की ओर से डॉ. मोहन भागवत को एक स्मृति चिन्ह भेंट किया गया. उन्होंने राजबक्शा हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना भी की और वहां मौजूद लोगों को दीपावली की शुभकामनाएं दीं. इस दौरान मंच पर फाउंडेशन के पदाधिकारी हनुमान प्रसाद राठी, गोपाल राठी, नंदकिशोर सारडा और सतीश लड्ढड़ मौजूद थे.