100 साल पहले की दिवाली की एक रात. भारत के एक गांव में मिट्टी के छोटे-से घर के आंगन में एक महिला बैठी थी. सामने 11 दीये रखे थे. वह हर दीये में सरसों का तेल बड़ी सावधानी से, कुछ बूंदें डाल रही थी. पास बैठा पोता पूछ बैठा, दादी, हम और दीये क्यों नहीं जलाते? दादी ने तेल की बोतल देखी और बोलीं, क्योंकि बेटा, कल खाना भी तो बनाना है. रात को दादी एक-एक करके दीये बुझाने लगीं. बच्चा सोच रहा था कि रोशनी का त्योहार अंधेरे में क्यों खत्म हो रहा है. वह इतना छोटा था कि समझ नहीं सकता था कि दादी दो रोशनियों में से चुनाव कर रही थीं. एक, जो आज घर को सुंदर बनाती. दूसरी, जो कल परिवार का चूल्हा जलाती.

साल था 1926. भारत अंग्रेजों के अधीन था. अनेक परिवारों में दिवाली की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती थी. मिट्टी की दीवारें हाथों से लीपी जातीं. पीतल के बर्तन राख और इमली से चमकाए जाते. चूल्हे पर मिठाइयां बनतीं. बच्चे नए कपड़ों का इंतजार करते, जो कई बार पूरे साल में एक ही बार मिलते थे. महिलाएं रूई से दीयों की बातियां बनातीं. गांव का कुम्हार सैकड़ों दीये बनाता और अक्सर पैसों के बदले अनाज लेकर उन्हें देता. त्योहार सबके हाथों की मेहनत से बनता था. हर कोई दूसरे के काम आता था.

हमें एक-दूसरे की जरूरत

जरा उस कुम्हार को देखिए. वह चाक के पास बैठा है. हाथ गीली मिट्टी से सने हैं. एक किसान अनाज लेकर आता है और बदले में दीयों की टोकरी ले जाता है. किसी ने किसी पर एहसान नहीं किया. दोनों ने अपनी मेहनत की चीज एक-दूसरे को दी. लेकिन इसमें एक गहरी बात छिपी है. एक परिवार अनाज उगाता है, दूसरा दीये बनाता है और मिलकर त्योहार मनाते हैं. हम अक्सर आजादी का मतलब किसी पर निर्भर न होना समझते हैं. लेकिन शायद जिंदगी की खूबसूरती इसी में है कि हमें एक-दूसरे की जरूरत होती है.

दिवाली के बाद नया साल शुरू

उसी भारत में दिवाली अलग-अलग तरह से मनाई जाती थी. दक्षिण भारत के कई हिस्सों में लोग सूरज निकलने से पहले उठते, तेल लगाकर स्नान करते, नए कपड़े पहनते और सुबह ही त्योहार मनाते. बंगाल में अमावस्या की रात काली पूजा होती. गुजरात में दिवाली के बाद नया साल शुरू होता. व्यापारी नए बहीखाते खोलते और अच्छे भविष्य की कामना करते. कहीं अमीरों के महल बिजली के हजारों बल्बों से जगमगाते, तो कहीं गांव के घरों में गिनती के दीये जलते. त्योहार सबका था, लेकिन सबकी परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं.

हजारों बल्ब देखकर हैरान बच्चा

किसी महल के बाहर खड़ा बच्चा हजारों बल्ब देखकर हैरान होता होगा. किसी दूर गांव का बच्चा एक मिट्टी के दीये को ही अनमोल समझता होगा. दोनों ने अपने जन्म की परिस्थितियां नहीं चुनी थीं. एक के पास बहुत कुछ था, दूसरे के पास बहुत कम. फिर भी दोनों रोशनी देख रहे थे. यहां एक सवाल उठता है. क्या हम किसी के त्योहार की चमक देखकर उसकी खुशी का अंदाजा लगा लेते हैं? क्या दूसरों के पास मौजूद चीजों को देखते हुए अपनी जिंदगी में मिली चीजें भूल जाते हैं?

दादी के 11 दीये

दादी के 11 दीये एक और सवाल उठाते हैं. क्या वह खुश थीं? हम नहीं जानते. गरीबी को केवल इसलिए सुंदर नहीं कहना चाहिए कि लोगों ने उसे हिम्मत से सहा. भोजन, पैसे और सुरक्षा की कमी कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है. दादी का तेल बचाना गरीबी की अच्छाई नहीं, मजबूरी में लिया गया कठिन फैसला था. लेकिन उस मजबूरी में प्यार भी था. वह चाहती थीं कि परिवार त्योहार भी मनाए और अगले दिन खाना भी खाए. उनके हाथ तेल नाप रहे थे, लेकिन मन में आज और कल, दोनों की चिंता थी.

सुविधाओं ने जिंदगी आसान बनाई

अब अपने घरों को देखिए. एक बटन दबाते ही रोशनी हो जाती है. मिठाइयां मिनटों में मिल जाती हैं. सालभर नए कपड़े खरीद सकते हैं. इन सुविधाओं ने जिंदगी आसान बनाई है और इनके लिए आभारी होना चाहिए. लेकिन सुविधा के साथ एक बदलाव भी आया है. हमें तैयार चीज दिखाई देती है, उसे बनाने वाला इंसान नहीं. दीया डिब्बे में आता है. खाना दरवाजे पर पहुंचता है. कपड़े पार्सल में मिलते हैं. कहीं कोई आज भी मिट्टी गूंध रहा है, अनाज उगा रहा है, खाना बना रहा है या कपड़े सिल रहा है. मेहनत खत्म नहीं हुई. बस हमारी नजरों से दूर चली गई है.

छोटी-छोटी चीजों की भी कीमत

शायद इसीलिए पुराने त्योहारों की याद मन को छू जाती है. जरूरी नहीं कि हम गरीबी या बिना बिजली वाली जिंदगी वापस चाहते हों. शायद हमें वह एहसास याद आता है, जब छोटी-छोटी चीजों की भी कीमत थी. साफ किया हुआ घर, किसी अपने के हाथ की मिठाई, दरवाजे पर प्यार से रखा दीया. लेकिन यादों की भी एक कमजोरी होती है. वे थकान से ज्यादा अपनापन याद रखती हैं. त्योहार सुंदर बनाने वाली दादी ने शायद कई दिन बिना आराम किए काम भी किया होगा. उनका पूरा सम्मान करने के लिए हमें उनका प्यार और उनकी मेहनत, दोनों याद रखने होंगे.

अगले त्योहार पर एक छोटा-सा प्रयोग कीजिए. रोशनी जलाने या मिठाई का डिब्बा खोलने से पहले उन तीन लोगों को याद कीजिए, जिनकी मेहनत से वह पल संभव हुआ. कोई हमारे पास बैठा होगा. कोई दूर रहता होगा. कोई शायद अब इस दुनिया में नहीं होगा. कृतज्ञता पर भाषण देने की जरूरत नहीं. किसी को याद करना, धन्यवाद कहना या अपने हिस्से की खुशी बांटना भी शुरुआत हो सकती है.

हर पीढ़ी के साथ हमारे घरों में रोशनी बढ़ी

उस कल्पना की दादी को 11 दीयों के सामने बैठे 100 साल बीत गए. यह दृश्य उस समय की परंपराओं और कठिनाइयों से जन्मी कल्पना है. हम उनका नाम नहीं जानते, न यह कि ऐसी बातचीत सचमुच हुई थी. लेकिन अनगिनत परिवारों ने ऐसे फैसले जरूर झेले. आज जब हम दीया जलाते हैं, तो शायद पिछली पीढ़ियों से कुछ और भी पाते हैं. उनकी मेहनत, उनके त्याग और उनकी यह उम्मीद कि आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी उनसे आसान होगी.
अगर हर पीढ़ी के साथ हमारे घरों में रोशनी बढ़ी है, तो क्या हमने उन लोगों को भी उतनी ही अच्छी तरह देखना सीखा है, जिनकी जिंदगी, मेहनत और त्याग से यह रोशनी हमारे घरों तक पहुंची है?