एक छोटे बच्चे ने अपने दादाजी से पूछा, दादाजी, जिंदगी का सबसे बड़ा सबक कहां मिलता है? दादाजी कुछ देर सोचकर बोले, तीन जगहों पर. अस्पताल, जेल और श्मशान. बच्चा हैरान रह गया. उसे लगा था कि दादाजी किसी स्कूल, मंदिर या खूबसूरत पहाड़ का नाम लेंगे. उसने पूछा, लेकिन दादाजी, ये तो दुख वाली जगहें हैं. दादाजी ने कहा, हां बेटा, कई बार हमें अपने पास मौजूद चीज़ों की कीमत तभी समझ आती है, जब हम देखते हैं कि किसी दूसरे से वही चीज़ छिन गई है. वर्षों बाद भी बच्चे को यह बात याद रही. इसलिए नहीं कि वे जगहें डरावनी थीं, बल्कि इसलिए कि हर जगह ने उससे एक ऐसा सवाल पूछा था, जो उसने पहले कभी खुद से नहीं पूछा था.

अस्पताल में पहुंचकर हमारी बनाई दुनिया अचानक छोटी लगने लगती है. करोड़ों का मालिक किसी अपने के इलाज के लिए परेशान खड़ा हो सकता है. एक मां अपने बच्चे के पास बैठकर उसके ठीक होने की प्रार्थना कर सकती है.

आराम से सांस लेने की उम्मीद

कोई मरीज बिना सहारे कुछ कदम चल पाने पर खुश हो सकता है. अस्पताल के बाहर हम ट्रैफिक, काम और छोटी-छोटी परेशानियों की शिकायत करते हैं. भीतर कोई आराम से सांस लेने की उम्मीद कर रहा होता है. बीमारी सबको एक जैसा नहीं बना देती. पैसे और इलाज की सुविधाओं से बहुत फर्क पड़ता है. लेकिन अस्पताल एक बात याद दिलाता है. हमारी सारी योजनाएं उस शरीर के सहारे चलती हैं, जिस पर हमारा पूरा अधिकार नहीं है.

कभी थकने का अधिकार नहीं?

अस्पताल हमें स्वास्थ्य की कीमत से भी गहरी बात सिखाता है. हम अपने शरीर से इतना काम क्यों लेते हैं, जैसे उसे कभी थकने का अधिकार ही नहीं? आराम टालते रहते हैं. थकान को सफलता की निशानी समझ लेते हैं. दूसरों की उम्मीदें पूरी करते हुए खुद को भूल जाते हैं. हमें लगता है कि स्वास्थ्य की चिंता कल कर लेंगे, आज काम जरूरी है. लेकिन जब शरीर साथ देना बंद करता है, तब समझ आता है कि हमारी कितनी आज़ादी उसी पर निर्भर थी. शायद अपना खयाल रखना स्वार्थ नहीं, बल्कि बाकी जिम्मेदारियां निभाने की पहली शर्त है.

कैदी की सबसे बड़ी इच्छा

दूसरी जगह है जेल. उसकी ऊंची दीवारों के पीछे ऐसे लोग रहते हैं, जिनकी आज़ादी सीमित है. कुछ गंभीर अपराधों की सजा काट रहे हैं, तो कुछ अभी मुकदमे के फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं. सबकी परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं. लेकिन जेल का बंद दरवाजा हमें आज़ादी की कीमत समझाता है. अपनी मर्जी से बाहर जाना, अपनों से मिलना, पसंद का खाना खाना या मन होने पर घर लौट आना हमें साधारण बातें लगती हैं. किसी कैदी के लिए यही सबसे बड़ी इच्छा हो सकती है.

कानून की किताब में लिखा अधिकार

आज़ादी केवल कानून की किताब में लिखा अधिकार नहीं है. वह रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसलों में भी महसूस होती है. लेकिन जेल एक और सवाल पूछती है. क्या कोई इंसान जेल के बाहर रहकर भी कैद हो सकता है? कोई परिवार को नाराज करने के डर से अपनी बात नहीं कह पाता. कोई बड़े पद पर बैठकर भी सच बोलने से डरता है. कोई अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए हर समय सावधान रहता है. ये परेशानियां असली जेल की कैद जैसी नहीं हैं. फिर भी ये बताती हैं कि डर हमारी जिंदगी को कितना छोटा कर सकता है. जेल हमें आज़ादी की कीमत समझाती है और यह भी पूछती है कि जो आज़ादी हमारे पास है, उसका हम क्या कर रहे हैं.

‘एक दिन सबकी जिंदगी समाप्त होती है’

तीसरी जगह है श्मशान या कब्रिस्तान. यहां पहुंचकर जिंदगी के बड़े-बड़े अंतर छोटे लगने लगते हैं. कोई राजा रहा हो, मजदूर, मशहूर कलाकार या साधारण इंसान, एक दिन सबकी जिंदगी समाप्त होती है. पद मृत्यु को नहीं रोक सकता. दौलत उससे हमेशा के लिए समझौता नहीं कर सकती. जिस शरीर के सहारे हमने इतने सपने देखे, उसे भी एक दिन मिट्टी में मिल जाना है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सफलता बेकार है या भविष्य की चिंता छोड़ देनी चाहिए.

इसका मतलब केवल इतना है कि हमें पूछना चाहिए कि जिन बातों में हम अपना इतना समय लगा रहे हैं, क्या वे सचमुच इतनी जरूरी हैं? कल्पना कीजिए, अंतिम संस्कार से लौटते हुए दो बुजुर्ग मित्र बात कर रहे हैं. एक कहता है, आखिर में कुछ भी मायने नहीं रखता. दूसरा जवाब देता है, शायद बात उलटी है. जिंदगी खत्म होती है, इसलिए जीते-जी हम जो करते हैं, वह और भी महत्वपूर्ण है. दोनों ने एक ही विदाई देखी. एक को निराशा मिली, दूसरे को जिम्मेदारी का एहसास. फर्क उनके देखने के तरीके में था. मृत्यु जिंदगी को बेकार नहीं बनाती. वह हमें समझा सकती है कि किसी से प्यार करना, सच बोलना और किसी की मदद करना कितना जरूरी है.

शायद इन तीन जगहों पर जाना हर इंसान के लिए जरूरी भी नहीं है. अस्पताल किसी का दुख देखने की जगह नहीं है. जेल कोई प्रदर्शनी नहीं है. किसी परिवार का शोक हमारे सीखने के लिए नहीं होता. हम दूसरों की पीड़ा में दखल दिए बिना भी उससे सीख सकते हैं. असली बात बाहर की इन जगहों को देखने की नहीं, अपने भीतर झांकने की है. अस्पताल पूछता है कि हम जीवन का खयाल कैसे रखते हैं.

हमारे लिए सचमुच महत्वपूर्ण क्या है?

जेल पूछती है कि अपनी आज़ादी का क्या करते हैं. श्मशान पूछता है कि बची हुई जिंदगी में हमारे लिए सचमुच महत्वपूर्ण क्या है और शायद सबसे बड़ा सबक इन तीन जगहों में नहीं, बल्कि इन्हें समझने के बाद हमारे जीने के तरीके में छिपा है. अगर हम पहले से जानते हैं कि स्वास्थ्य कभी भी बिगड़ सकता है, आज़ादी अनमोल है और जिंदगी बहुत छोटी है, तो फिर हम किस चीज़ के छिन जाने का इंतज़ार कर रहे हैं, जिसके बाद हमें सचमुच जीना याद आएगा?