एक स्कूल में अध्यापिका ने बच्चों को अनोखा काम दिया. उन्होंने कहा, अपनी पूरी जिंदगी की कहानी एक वाक्य में लिखो. बच्चे हैरान रह गए. एक ने लिखा, मैं पायलट बनना चाहता हूं. दूसरे ने लिखा, ‘मैं अपनी मां को खुश रखना चाहता हूं. एक छोटी बच्ची खाली कॉपी लेकर बैठी रही. अध्यापिका ने पूछा, ‘तुमने कुछ क्यों नहीं लिखा? बच्ची बोली, ‘लेकिन मैडम, मेरी जिंदगी तो अभी शुरू ही नहीं हुई. अध्यापिका मुस्कुराईं, ‘तो कल तुम क्या कर रही थीं? बच्ची सोचने लगी. कल वह भाई के साथ खेली थी, खिलौना टूटने पर रोई थी और दादी का चश्मा ढूंढ़ने में मदद की थी. धीरे-धीरे उसे समझ आया कि जिंदगी शुरू होने का इंतजार नहीं कर रही थी. वह तो हर दिन जी रही थी, उन साधारण दिनों में भी जिन्हें हम याद रखने लायक नहीं समझते.

अब यही सवाल किसी 90 साल के बुजुर्ग से पूछिए. वह कहां से शुरू करेगा? बचपन से? पहली नौकरी से? शादी से? किसी अधूरे सपने से? बच्चे के जन्म से? या उस दिन से, जब कोई अपना हमेशा के लिए चला गया? 90 साल में हजारों सुबहें, अनगिनत बातचीत, डर, खुशियां और ऐसे साहस भरे पल होते हैं जिन्हें किसी ने देखा तक नहीं. इतना सब एक वाक्य में कैसे समाएगा? शायद नहीं समा सकता. लेकिन उस एक वाक्य को चुनने की कोशिश हमें बता सकती है कि हम अपनी जिंदगी को कैसे देखते हैं.

अनुभवों ने हमें कैसा इंसान बनाया?

हम अपनी कहानी अक्सर घटनाओं से बताते हैं. कहां पढ़े, क्या बने, कितना कमाया, किससे शादी हुई और क्या हासिल किया. ये बातें महत्वपूर्ण हैं. लेकिन ये हमेशा नहीं बतातीं कि इन सबके बीच हमारे भीतर क्या बदला. कोई व्यक्ति बहुत बड़े पद तक पहुंचकर भी उस दिन को सबसे ज्यादा याद कर सकता है, जब किसी ने उसकी बड़ी गलती माफ कर दी थी. कोई साधारण नौकरी करने वाला इंसान कठिन समय में निभाए गए एक वादे से संतुष्ट हो सकता है. बाहर की कहानी बताती है कि हमारे साथ क्या हुआ. भीतर की कहानी पूछती है कि उन अनुभवों ने हमें कैसा इंसान बनाया.

दिल के सबसे करीब

कल्पना कीजिए, एक आदमी घर बदलते समय पुरानी अलमारी खोलता है. उसमें स्कूल का प्रमाणपत्र, पहली नौकरी का पत्र, पुराने दोस्तों की तस्वीरें और किसी दिवंगत अपने की लिखी छोटी-सी चिट्ठी मिलती है. वह प्रमाणपत्र संभालकर डिब्बे में रख देता है. लेकिन चिट्ठी पढ़ते ही बैठ जाता है. कई मिनट तक वही शब्द पढ़ता रहता है. उस कागज पर उसकी किसी सफलता का जिक्र नहीं है. फिर भी उसमें कुछ ऐसा है जो प्रमाणपत्रों में नहीं. उसे समझ आता है कि जिन घटनाओं को कभी सबसे महत्वपूर्ण समझा था, जरूरी नहीं कि वही दिल के सबसे करीब हों.

हमारी याददाश्त अच्छी कहानीकार नहीं होती

हमारी यादों में भी एक अजीब विरोधाभास है. दोस्त की पुरानी गलती माफ कर देते हैं, लेकिन अपनी गलती के लिए खुद को सजा देते रहते हैं. 10 सफलताओं से ज्यादा एक असफलता याद रहती है. किसी फैसले पर वर्षों पछताते हैं, जबकि यह जानते ही नहीं कि दूसरा रास्ता चुनते तो क्या होता. यादें केवल बीता समय नहीं संभालतीं. वे यह भी तय करती हैं कि हम किस बात को कितना महत्व देंगे. कभी-कभी हमारी याददाश्त अच्छी कहानीकार नहीं होती. वह पछतावे को बहुत जगह देती है, लेकिन मिली हुई दया, अपने साहस और मुश्किल दिनों को पार करने की कहानी छोटी कर देती है.

क्या जिंदगी का एक वाक्य केवल खुशियों से भरा होना चाहिए?

लेकिन क्या जिंदगी का एक वाक्य केवल खुशियों से भरा होना चाहिए? तब बहुत कुछ छूट जाएगा. क्या उसमें केवल दुख होना चाहिए? यह भी गलत होगा. जिंदगी कभी एक जैसी नहीं होती. हम किसी से प्यार करते हुए भी उसे दुख पहुंचा सकते हैं. सफलता पाकर भी उलझन में रह सकते हैं. अपनों को खो सकते हैं, अपने विचार बदल सकते हैं और फिर से शुरुआत कर सकते हैं. कभी पता चलता है कि हम वह इंसान नहीं बने जिसकी कभी कल्पना की थी. शायद सच्चे वाक्य में इन सबके लिए जगह होनी चाहिए. जिंदगी को सुंदर दिखाना जरूरी नहीं, उसे सच्चाई से स्वीकार करना जरूरी है.

एक खतरा यह भी है कि हम मान लेते हैं कि हमारी कहानी पूरी हो चुकी है. 20 साल का नौजवान परीक्षा में असफल होकर हार मान सकता है. 50 साल का व्यक्ति सोच सकता है कि अच्छे दिन बीत गए. 80 साल का बुजुर्ग मान सकता है कि अब कुछ नया नहीं बचा. लेकिन कल क्या होगा, कोई नहीं जानता. बीता कल बदल नहीं सकते, लेकिन आज उसका सामना कैसे करेंगे, यह बदल सकते हैं. हमारी कहानी उन छोटे फैसलों से आगे बढ़ती रहती है जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता.

आज रात हम भी अध्यापिका का दिया काम करें

शायद आज रात हम भी अध्यापिका का दिया काम करें. एक कागज लें और अपनी जिंदगी के बारे में एक वाक्य लिखें. ऐसा नहीं जिसे पढ़कर लोग तारीफ करें. ऐसा लिखें जिसमें आप खुद को पहचान सकें. फिर उसे ध्यान से पढ़ें. क्या लिखा और क्या छोड़ दिया? क्या अपने प्रिय लोगों को याद किया? क्या अपनी गलतियों को भी जगह दी? क्या ऐसे लिखा जैसे सब खत्म हो चुका है, या जैसे अभी कुछ नया शुरू हो सकता है?

अगर मुझे लिखना हो, तो शायद मैं लिखूंगा, सब कुछ मेरी इच्छा के अनुसार नहीं हुआ. लेकिन मैंने जिंदगी जी, प्यार किया, सीखा और आज भी आगे बढ़ रहा हूं. फिर मैं सोचूंगा कि क्या यह एक वाक्य भी मेरी पूरी कहानी कह पाया? अगर आपकी पूरी जिंदगी को एक ही वाक्य में लिखना पड़े, तो आप वह कहानी लिखेंगे जो आपके साथ घटी, या वह कहानी जो बताती है कि उन सबके बाद आप कैसे इंसान बने?