आज मैं चांदनी चौक की गलियों में घूम रहा था. एक पल के लिए मन हुआ कि काश, समय यहीं ठहर जाए. इसलिए नहीं कि सड़कों पर गाड़ियां रुक जाएं या दुकानें बंद हो जाएं, बल्कि इसलिए कि मैं समझना चाहता था कि जिस जगह को मैंने कभी अपना घर नहीं कहा, वह मुझे किसी अपने की याद क्यों दिला रही थी. चारों ओर साइकिल रिक्शे थे, दुकानों पर भीड़ थी, बच्चे अपने माता-पिता के साथ चल रहे थे. एक बुजुर्ग रिक्शावाला अपने सफेद बालों और थके हुए चेहरे के साथ हैंडल पकड़े खड़ा था. वह रास्ता खाली होने का इंतजार कर रहा था. मेरी नजर उसके हाथों पर ठहर गई. मैं उसे जानता नहीं था, फिर भी उसके हाथ जाने-पहचाने लगे. शायद उन्होंने मुझे उन लोगों की याद दिला दी, जो कभी हमारे आसपास चुपचाप मेहनत करते थे, जबकि हम अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने की जल्दी में रहते थे.
कब हुई थी चांदनी चौक की शुरुआत?
चांदनी चौक की शुरुआत लगभग 1650 में शाहजहां के शासनकाल में हुई थी. इसकी बनावट में उनकी बेटी जहांआरा बेगम की महत्वपूर्ण भूमिका थी. आज करीब 376 साल बीत चुके हैं. मैं सोचने लगा कि इन गलियों में कितने बच्चों ने अपने पिता की उंगली पकड़कर चलना सीखा होगा. कितनी मांएं कपड़े खरीदते समय बच्चों से कहती होंगी कि थोड़ा इंतजार करो. कितने दादा-दादी कागज में लिपटी मिठाइयां घर लाए होंगे. वे बच्चे बड़े हुए होंगे, फिर माता-पिता और दादा-दादी बने होंगे. कुछ अब इस दुनिया में नहीं होंगे. लेकिन आज भी इन्हीं गलियों में कोई बच्चा किसी अपने की उंगली पकड़कर चल रहा है. चेहरे बदल गए, मगर जिंदगी की छोटी-छोटी बातें आज भी वैसी ही हैं.
इंसान और किसी पुरानी जगह का रिश्ता अनोखा
प्राचीन गौरी शंकर मंदिर के पास मैंने गुलाबी पगड़ी पहने एक बुजुर्ग को देखा. पीछे मंदिर खड़ा था, जिसकी दीवारों पर बीते वर्षों की छाप थी. मुझे नहीं मालूम वह बुजुर्ग कहां जा रहे थे. शायद पहली बार आए हों, शायद बरसों से आते रहे हों. उन्हें देखकर लगा कि इंसान और किसी पुरानी जगह का रिश्ता कितना अनोखा होता है. इमारतें पीढ़ियों तक खड़ी रहती हैं, लेकिन उनके आसपास रहने वाले लोग धीरे-धीरे विदा हो जाते हैं. यह मंदिर हममें से बहुतों के जन्म से पहले भी था और हमारे जाने के बाद भी शायद रहेगा. लेकिन इसके सामने से गुजरने वाले हर इंसान की अपनी अलग कहानी है.
पुरानी दिल्ली की जानी-पहचानी खुशबू
फिर पुरानी दिल्ली की वह जानी-पहचानी खुशबू मिली. गरम तेल में पकते पकवान, चाशनी में डूबी मिठाइयां, चाय, मसाले और दुकानों से आती इत्र की महक. कुछ खुशबुएं बिना कुछ कहे हमें बरसों पीछे ले जाती हैं. किसी को मिठाई की दुकान देखकर पिता याद आ जाते होंगे, जो रविवार को छोटा-सा डिब्बा लाते थे. किसी को पकवानों की खुशबू से मां की रसोई याद आती होगी. शादी के कपड़ों की दुकान देखकर किसी को बहन की शादी याद आ सकती है, जब पूरा परिवार खरीदारी करने निकला था. दुकान आज भी वहीं होगी. मिठाई का स्वाद भी शायद वैसा ही होगा. लेकिन जो इंसान कभी हमारे साथ खड़ा था, वह अब नहीं होगा. और देखते-देखते एक साधारण बाजार यादों से भरी जगह बन जाता है.
आज का कितना कुछ याद रहेगा?
पुराने लाजपत राय बाजार में मैंने बच्चों को भीड़ के बीच चलते देखा. कुछ दुकानों को देख रहे थे, कुछ अपने साथ आए बड़ों के पास चल रहे थे. मैं सोचने लगा कि 30-40 साल बाद इन्हें आज का कितना कुछ याद रहेगा. दुकानों की रोशनी, खाने की खुशबू या अपनी पसंद की कोई चीज खरीदने की खुशी? या फिर वह हाथ, जिसने भीड़ में इन्हें कसकर पकड़ा था? बचपन भी कितना अजीब होता है. हमें मालूम ही नहीं होता कि कौन-सा मामूली पल जिंदगीभर याद रह जाएगा. कभी महंगे उपहार भूल जाते हैं, लेकिन किसी अपने के हाथ से मिली छोटी-सी मिठाई नहीं भूलती.
रानी इमारतों के साथ नई दुकानें
चित्राला चौक पर पुरानी इमारतों के साथ नई दुकानें खड़ी थीं. मोबाइल ठीक करने के बोर्ड, चमकते विज्ञापन और यातायात के संकेत उन दीवारों के बीच दिखाई दे रहे थे, जिन्होंने एक दूसरी दिल्ली देखी थी. आगे दुकानों के शीशों के पीछे शादी के कपड़े चमक रहे थे. रिक्शावाले यात्रियों को लेकर भीड़ से रास्ता बना रहे थे. तस्वीरें देखते हुए मुझे लगा कि कल की दिल्ली पूरी तरह गायब नहीं हुई है. वह आज भी नए नामों, नई दुकानों और बदली हुई आदतों के पीछे कहीं मौजूद है. लेकिन आज की दिल्ली भी नई यादें बना रही है. आज इन गलियों में घूमने वाले बच्चे शायद एक दिन सफेद बालों के साथ लौटेंगे और उस दुकान को खोजेंगे, जो तब तक बंद हो चुकी होगी. शायद किसी ऐसे चेहरे को ढूंढ़ेंगे, जो फिर कभी दिखाई नहीं देगा.
दुकानदार के लिए ग्राहकों और खर्चों की चिंता
लेकिन इन यादों के बीच मैं वहां काम करने वालों को भूलना नहीं चाहता था. मेरे लिए चांदनी चौक तस्वीरें लेने और पुरानी यादों को महसूस करने की जगह थी. रिक्शावाले के लिए वह रोजी कमाने का एक और दिन था. दुकानदार के लिए ग्राहकों और खर्चों की चिंता थी. भारी सामान उठाने वाले मजदूर के लिए मेहनत का एक और दिन. जिस गली को देखकर किसी का बचपन लौट आता है, वही गली शाम तक किसी दूसरे इंसान को थका देती है. पुरानी जगहों से प्यार तभी पूरा होता है, जब हम उन्हें जीवित रखने वाले लोगों को भी देखते हैं.
चलते-चलते मैं अपनी जिंदगी के बारे में सोचने लगा. कितनी बार अपनों के पास से जल्दी में गुजर गया होऊंगा. कितनी साधारण शामें साथ बिताईं, बिना यह समझे कि एक दिन वही सबसे प्यारी यादें बन जाएंगी. हम सोचते रहते हैं कि फिर मिलेंगे, फिर साथ खाना खाएंगे, फिर बैठकर बातें करेंगे. बाद में समझ आता है कि जिंदगी के कुछ सबसे सुंदर दिन वही थे, जिनमें कुछ खास हुआ ही नहीं था. हम उन्हें पहचान नहीं पाए, क्योंकि तब सब अपने आसपास मौजूद थे.
इमारतों, दुकानों, बच्चों और रिक्शावालों की तस्वीरें
चांदनी चौक से मैं इमारतों, दुकानों, बच्चों और रिक्शावालों की तस्वीरें लेकर लौटा. पुरानी दिल्ली का कोई बुजुर्ग इन्हें देखकर शायद किसी दरवाजे, किसी आवाज या उस इंसान को याद करेगा, जो कभी वहां उसका इंतजार करता था. कोई बच्चा आज की इस यात्रा की छोटी-सी याद अपने बुढ़ापे तक संभालकर रखेगा. और मैं सोचता रहा कि क्या हम सचमुच अपनी प्रिय जगहों पर लौटते हैं, या उन लोगों और अपने उस पुराने रूप को खोजते रहते हैं, जिन्हें समय के साथ कहीं पीछे छोड़ आए हैं.
आज की पीढ़ी क्या चांदनी चौक पर भरोसा कर पाएगी?
मैं सोचता हूं कि आज की पीढ़ी क्या चांदनी चौक पर आगे भी भरोसा कर पाएगी. मॉल का कल्चर क्या ऐसे बाजारों को मुफीद रहने देगा. हाइजिन और सुविधा की लड़ाई कहीं इन बाजारों को खत्म तो नहीं कर देगी. क्या हम इसी युवा पीढ़ी से कुछ ऐसे लोगों को बचा पाएंगे जिन्हें चांदनी चौक की गलियों में जन्नत दिखेगी. एक विरासत है, परंपरा है जो वर्षों-वर्षों से चली आ रहीं दुकानें समेटे हुए हैं. इन्हें संवारने की, सुधारने की, नए कलेवर में ढालने की भी जिम्मेदारी भी उन दुकानदारों को निभानी चाहिए जो इसे बनाए रखना चाहते हैं. जिनकी कई पीढ़ियां यहां काम करके जवान और बूढ़ी हुई हैं.
चांदनी चौक का गुलजार रहना केवल दिल्ली या किसी दुकानदार की माली हालत से जुड़ा मामला नहीं है. यह रवायत, किफायत और जेहन से जुड़ा मामला है. बरसों बाद जब हम किसी पुरानी जगह लौटते हैं, तो आखिर हमें किसकी कमी सबसे ज्यादा महसूस होती है? उन गलियों की, जो बदल गईं, उन अपनों की, जो अब नहीं रहे, या अपने ही उस पुराने रूप की, जो कभी उन्हीं गलियों में जीता था?

