Thekua History: किसी त्योहार की याद उसके पकवानों के बिना अधूरी लगती है. बिहार में छठ महापर्व की बात हो, तो गुड़ और घी की खुशबू वाला ठेकुआ सबसे पहले याद आता है. बचपन में घर की रसोई में बनते ठेकुआ का इंतजार करना और पूजा के बाद इसे प्रसाद के रूप में पाना, कई लोगों के लिए आज भी खास याद है.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ठेकुआ की शुरुआत कैसे हुई? यह छठ का इतना खास प्रसाद कब और कैसे बन गया? आइए जानते हैं इस पारंपरिक पकवान (Thekua History) की दिलचस्प कहानी.
Thekua History: सदियों पुराना है ठेकुआ का इतिहास
ठेकुआ बिहार के साथ झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में भी काफी समय से बनाया जा रहा है. हालांकि, इसकी शुरुआत किसने और कब की, इसका कोई प्रमाणित ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं मिलता. इसलिए इसकी उत्पत्ति को लेकर किसी एक कहानी को सही नहीं माना जा सकता.
पुराने समय में गांवों में गेहूं का आटा, गुड़, घी और सौंफ जैसी चीजें आसानी से मिल जाती थीं. इन्हीं साधारण सामग्रियों से ठेकुआ तैयार किया जाता था. इसे बनाने का तरीका भी आसान था और अच्छी तरह तलने के बाद इसे कुछ समय तक रखा जा सकता था.
कैसे पड़ा इसका नाम ठेकुआ?
ठेकुआ के नाम के पीछे भी एक दिलचस्प मान्यता है. पारंपरिक तरीके से इसे बनाने के लिए आटे की छोटी-छोटी लोइयां तैयार की जाती हैं. फिर लकड़ी के नक्काशीदार सांचे पर रखकर हथेली से दबाया जाता है.
इससे ठेकुआ पर फूल-पत्तियों जैसी सुंदर आकृतियां बन जाती हैं. माना जाता है कि ठोकने या दबाने की इसी प्रक्रिया से इसका नाम ठेकुआ (Thekua History) पड़ा. अलग-अलग इलाकों में इसे खजुरिया, खजूर और ठोकवा के नाम से भी जाना जाता है.

ऐसे तैयार होता है पारंपरिक ठेकुआ
- ठेकुआ बनाने के लिए गेहूं के आटे में गुड़ का घोल, देसी घी और सौंफ मिलाई जाती है.
- कुछ घरों में स्वाद बढ़ाने के लिए इलायची और नारियल भी डाला जाता है.
- इसके बाद सख्त आटा गूंथकर छोटी-छोटी लोइयां बनाई जाती हैं.
- इन्हें सांचे से आकार देकर धीमी आंच पर सुनहरा और कुरकुरा होने तक तला जाता है.
छठ पूजा में क्यों है इतनी खास अहमियत?
ठेकुआ की पहचान छठ महापर्व के प्रसाद के रूप में सबसे ज्यादा है. छठ के दौरान शुद्धता और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है. प्रसाद बनाने के लिए गेहूं को धोकर सुखाया जाता है और फिर उसे पीसकर आटा तैयार किया जाता है.
छठ के तीसरे दिन डूबते सूर्य और चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देते समय बांस के सूप में ठेकुआ के साथ केला, नारियल, गन्ना और दूसरे फल सजाए जाते हैं. इसे सूर्य देव और छठी मैया को अर्पित किया जाता है. कुछ इलाकों में पुआ भी प्रसाद के रूप में बनाया जाता है, लेकिन ठेकुआ और पुआ दोनों अलग-अलग पकवान हैं.
बिहार से विदेशों तक पहुंचा ठेकुआ का स्वाद
आज ठेकुआ सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है. पढ़ाई और नौकरी के लिए दूसरे शहरों में रहने वाले बिहारी परिवार भी छठ पर इसे बनाना नहीं भूलते. इसकी पहचान देश से बाहर भी पहुंची है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी यूरोप यात्रा के दौरान स्लोवाकिया के स्पीकर को ठेकुआ भेंट किया था.
इस तरह ठेकुआ सिर्फ आटे, गुड़ और घी से बना पकवान नहीं, बल्कि बिहार की संस्कृति, लोकआस्था और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का स्वाद है. यही वजह है कि छठ आते ही इसकी खुशबू हर बिहारी के मन में घर की याद ताजा कर देती है.
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