एक बुज़ुर्ग माली हर सुबह अपने घर के बाहर लगे दो पौधों को पानी देता था. एक पौधा बड़ा हो चुका था और उसकी डालियों पर सुंदर फूल खिले थे. दूसरा छोटा था, जिस पर कुछ पत्तियां ही थीं. उसका पोता कई दिनों से दोनों को देख रहा था. एक दिन उसने पूछा, दादाजी, यह पौधा बड़ा क्यों नहीं होता? दादाजी ने उसकी पत्तियों को छूकर कहा, यह भी बढ़ रहा है. तुम केवल ज़मीन के ऊपर देख रहे हो. बच्चा पास बैठ गया. उसने पूछा, इसमें फूल कब आएंगे? दादाजी मुस्कुराए, पता नहीं. शायद बाद में आएं, शायद कभी न आएं. लेकिन क्या फूल न आने से इसके जीने का कोई मतलब नहीं रह जाता? बच्चा सोच में पड़ गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि बिना फूल दिए भी कोई पौधा कीमती हो सकता है.

हम बचपन से तरक्की को उन्हीं चीज़ों से पहचानते हैं जो दिखाई देती हैं. बच्चा लंबा हो गया. विद्यार्थी के नंबर बढ़ गए. कर्मचारी को बड़ा पद मिल गया. परिवार ने बड़ा मकान खरीद लिया. हमें लगता है कि यही आगे बढ़ने की निशानी है. लेकिन प्रकृति में सबका बढ़ने का तरीका अलग है. कोई पेड़ अपनी जड़ें मजबूत करने में वर्षों लगाता है. कोई नदी पहाड़ों और घाटियों से होकर अपना रास्ता बनाती है. कोई फूल थोड़े समय के लिए खिलता है, जबकि कोई पौधा सालभर हरा रहता है. इससे किसी का जीवन छोटा या बड़ा नहीं हो जाता. फिर भी हम मान लेते हैं कि जो तरक्की दूसरों को दिखाई नहीं देती, वह तरक्की है ही नहीं.

माता-पिता की देखभाल के लिए नौकरी छोड़ी

एक महिला ने अपने बूढ़े माता-पिता की देखभाल के लिए नौकरी छोड़ दी. पांच साल बाद उसके साथ काम करने वाले लोग बड़े पदों पर पहुंच चुके थे. एक दिन किसी ने पूछा, इन पांच वर्षों में आपने क्या हासिल किया? वह तुरंत जवाब नहीं दे पाई. उसने बिना कुछ कहे किसी का दर्द समझना सीखा था. कठिन रातों में धैर्य रखना सीखा था. यह जाना था कि कभी-कभी किसी अपने की आवाज़ ही सबसे बड़ी दवा होती है. लेकिन इन बातों का कोई प्रमाणपत्र नहीं मिलता. उसे लगा कि दुनिया आगे निकल गई और वह पीछे रह गई. लेकिन क्या वह सचमुच पीछे रह गई थी, या उसने ऐसी बातें सीखी थीं जिन्हें दुनिया गिनना नहीं जानती?

हर बात को समय के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं

लेकिन प्रकृति से सीखने का मतलब हर बात को समय के भरोसे छोड़ देना भी नहीं है. पेड़ अपनी जगह नहीं बदल सकता, लेकिन इंसान रास्ता बदल सकता है. वह मदद मांग सकता है, नया काम सीख सकता है और गलत परिस्थितियों से बाहर निकल सकता है. केवल इंतज़ार करना हमेशा समझदारी नहीं होती. पानी के बिना पौधा यह सोचकर जीवित नहीं रह सकता कि एक दिन उसका मौसम आएगा. उसी तरह इंसान को भी अवसर, सहारा और मेहनत चाहिए. प्रकृति हमें धैर्य सिखाती है, लेकिन यह भी बताती है कि बढ़ने के लिए क्या ज़रूरी है.

असली जिंदगी किसी बड़ी सफलता के बाद शुरू होगी

शायद हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम मान लेते हैं कि असली जिंदगी किसी बड़ी सफलता के बाद शुरू होगी. नौकरी मिलेगी तो खुश होंगे. घर बनेगा तो चैन मिलेगा. परेशानी खत्म होगी तो जीना शुरू करेंगे. तब तक खुद को अधूरा समझते रहते हैं. लेकिन लिखना सीख रहा बच्चा भी जिंदगी जी रहा है, भले ही वह पूरा वाक्य न लिख पाए. कठिन धुन का अभ्यास करने वाला व्यक्ति भी संगीत से जुड़ा है. बुढ़ापे में मोबाइल चलाना सीख रहा इंसान भी कुछ नया सीख रहा है. सीखने के वे दिन भी उसकी जिंदगी का हिस्सा हैं.

मंजिल पर पहुंचने की खुशी

कल्पना कीजिए, दो दोस्त बगीचे में घूम रहे हैं. एक ने खिला हुआ गुलाब देखकर कहा, देखो, आखिर इसमें फूल आ गया. दूसरे ने पास के छोटे पौधे की ओर इशारा किया, और इसका क्या? पहला बोला, इसमें तो अभी कुछ हुआ ही नहीं. लेकिन उस पौधे में भी बहुत कुछ हुआ था. उसने गर्मी सही थी, मिट्टी से पानी लिया था और नई पत्तियां निकाली थीं. हम अपनी जिंदगी को भी कई बार ऐसे ही देखते हैं. पुरस्कार मिलने वाला साल याद रखते हैं, लेकिन धैर्य सीखने वाले साल भूल जाते हैं. मंज़िल पर पहुंचने की खुशी मनाते हैं, लेकिन वहां तक पहुंचाने वाले साधारण दिनों को महत्व नहीं देते.

हर इंसान की सफलता

एक सवाल और है. आखिर किसने तय किया कि हर इंसान की सफलता ऐसी होनी चाहिए जिसे दुनिया देख सके? कोई बड़ा काम करता है. कोई चुपचाप परिवार संभालता है. कोई टूटते रिश्ते जोड़ता है. कोई दूसरों की मुश्किलें कम करता है. कोई बड़ी उम्र में अपनी नई क्षमता पहचानता है. कोई कम चीज़ों में संतोष पाना सीखता है. सबकी उपलब्धियां एक जैसी नहीं हैं और सबकी परेशानियां भी बराबर नहीं हैं. लेकिन अच्छी जिंदगी जीने के लिए सबको एक ही रास्ते पर चलना ज़रूरी नहीं है.

पहले से ज्यादा धैर्य

शायद आज रात हम खुद से कुछ अलग सवाल पूछ सकते हैं. यह गिनने के बजाय कि अभी क्या हासिल नहीं हुआ, सोचें कि हमारे भीतर क्या बदला है. क्या हम किसी के साथ पहले से ज्यादा धैर्य रखते हैं? क्या अपनी गलती स्वीकार करने से कम डरते हैं? क्या अब बेहतर समझते हैं कि हमारे लिए क्या ज़रूरी है? और अगर कुछ नहीं बदला, तो कल कौन-सा छोटा कदम उठा सकते हैं?

अगले साल बसंत में पोता फिर दादाजी के पास आया. छोटे पौधे में नई डालियां निकल आई थीं, लेकिन फूल अब भी नहीं थे. इस बार बच्चे ने नहीं पूछा कि फूल कब आएंगे. वह चुपचाप पानी लेकर आया और पौधे के पास बैठ गया. अगर हम पूरी जिंदगी उस दिन का इंतज़ार करते रहेंगे जब हम आखिरकार खिलेंगे, तो उससे पहले के इतने सारे दिनों की जिंदगी कौन जिएगा?